नकाब
नकाब
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एक नौका के
सभी सवार हैं,
उठ रहे 'नकाब'हैं;
समझ आया-
सत्ता कंगाल है!
'कर' जो जन से
जाते रहे-
घर किसी और के
भरते रहे,
पेट गरीब के
कटते रहे!
एक रात में सभी
हमप्याला हो गये
सभी के स्वर,
एक हो गये!
बदल गये नियम
ताक पर रख सिद्धांत,
विडम्बना देश की देख
भर आयी आँख!
हर दानी भीगे मन
मल रहा खाली हाथ!
खेतों में -
सड़ रही आस है,
सडक पर
बिक रही प्यास है;
हर समाचार बेच रहा
सम्मान है,
चैनल दर चैनल
बिक रहा 'डर' है,
संभलो!
मौत खडी द्वार है;
बटोर रहा
वह भी धन है!
भय भगा,
अभाव भुला
हर साहसी -
पी रहा जहर है!
पता ये चला आज
एक बोतल पर बिकता रहा
क्यों इंसान है!!
सुरभि ✍