विचार मंथन

  आज संपूर्ण  विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा है। अमेरिका और रूस  जैसी महाशक्तियों को भी इसने असहाय की स्थिति में ला खडा किया है । पूरा यूरोप भी असमय काल का ग्रास बने  मृतको से पट गया है। 
कविवर रामधारीसिंह दिनकर की कविता की पंक्ति याद आ रही है- 
'मृतकों से पटि भू है पहचान कहाँ इसमें तू है'
मानव जाति की अमानवीयता चाहे किसी के भी द्वारा- मनुष्य के प्रति या  पशु पक्षियों के प्रति या फिर प्रकृति के प्रति की गई हो उसका भुगतान सभी को करना पडेगा। 
परस्पर प्रतिद्वंद्वी  राष्ट्र  चीन अमेरिका एक दूसरे पर दोषारोपण कर अपनी भडास निकाल रहे हैं ।सत्य किसी से नहीं छिपा कि आधुनिकता,  औद्योगीकरण,  वैश्वीकरण की दौड़ ने मानव जाति को आज इस कगार पर ला खडा किया है कि सभी प्रयास साधन सीमित पड गये हैं।
ऑसू बहाने का भी समय नहीं  है।
हर चहरे पर भय और मायूसी के भाव हैं ।
 हर राष्ट्र युद्ध स्तर पर महामारी पर विजय के लिये तडप  रहा है। 
सही अर्थों में आज डाक्टर देवदूत हैं ।
जीवन डोर उन्हीं के हाथों में है ।  
हम सभी का कर्तव्य है कि उन सभी के स्वास्थ्य को भी ध्यान में रखते हुये 
समाज-राष्ट्र और घर तीनों स्तरों पर सौहार्दपूर्ण वातावरण रखें । सरकार के आवश्यक आदेश और निर्देश का पालन करते  हुए परिपक्व नागरिक की भूमिका निभायें। संकट और सभी बाधा दूर होगी यह विश्वास भी बनाये  रखना हम सभी के लिए आवश्यक है । विशेष बात यह कि विशाल संख्या वाले भारत द्वारा जिस सूझ बूझ से स्थति को संभाला जा रहा है, विश्व के लिए उदाहरण बन गया है। हमे विश्वास है कि  धैर्य, निष्ठा  और सतत प्रयास  के माध्यमों से covid19 से लडे जा रहे युद्ध में आशा का प्रकाश विजयी होगा।
जब से मनुष्य ने दिशाहीन भागते कदमों को थामा है तभी से प्रकृति मुस्कुरा रही है। शहरों का सौदर्य लौट आया है। हमालय की चोटी भी निकट आ गयी है। तापमान  कम हुआ है।
  प्राणधारी अन्य जीवों का स्वाभाविक जीवन लौट आया है ।  इस मंत्र  'जियो और जीने दो के साथ ' जीवन के इस वास्तविक अर्थ और स्वरूप को हमें समझना होगा कि
 धर्म से अर्जित धन नियंत्रित जीवन सीमित साधन और शुद्ध खान-पान और स्वास्थ्य ही साथ देते हैं ।
हम ईश्वर से यही प्रार्थना करें-
यो नः स्रष्टा यः पिता यश्च पाता यो वेत्ति सर्वाणि जगन्ति साक्षी ।
यो देवानामान्यखिलानि धत्ते स मंगलं नः सततं तनोतु।।
जो हम सब को उत्पन्न करने वाला है जो संसार के व्यापारों को प्रति क्षण देखता रहता है, जो सब देवताओं का स्वरूप है ऐसा परमेश्वर सब दिन हमारा मंगल करे।
                           सुरभि 



Popular posts from this blog

संक्रमण जाल

करुणामयी प्रकृति