'कोरोना'👾 के जाल में फंसा हमारा जीवन-- चार दीवारी में रहेगा तो क्या पाएंगे ? जीवन शेष नहीं रहेगा तो साथ में क्या ले जायेंगे? सभी चाहते हैं शीघ्र संक्रमण जाल कटे--- चलिए फिर से जुड़ने के लिए दूरी बनाएँ 😷 🚶♀️🚶♂️ हाथ जोड अभिवादन करें 🙏 दूर संचार से📞हाल जानें झरोखो से 🏠 मुस्कुराहटें बांटे 😊 विचलित जन को धैर्य दिलाएँ 😌 टूटे मन हैं जो ढाढ़स उन्हें बंधायें नेक काम में हाथ बटायें 👨⚕️ चिंतन करें मनन करें 🧘♀️ राष्ट्र और विश्व के लिये शुभ की कामना करें 🙋♀️🌾 सुरभि
🦚करुणामयी प्रकृति 🦚 प्रकृति का रूप सलोना नयनाभिराम हरित धरा नीचे ऊपर व्योम विशाल गृह नक्षत्र रचते नभ संसार! नीलाम्बर छूते सघन तरु वृक्ष- वृक्ष खग वृंद कोयल की मधुर कूक सुन बोल उठती मृदंग मन मयूर नाच उठता बहती जब सुरभि अनिल रंग-बिरंगी देख तितलियाँ प्रसून सम खिल जाता मन वनचर विचरते जब जंगम हो जाता वन कुलाचे भरता भाता हिरण लहरों पर करते नर्तन जब जलचर किलक उठता बचपन अचल के आँचल तले लहराते देख धान कृषक मस्तक दमकते तब स्वेद कण ! बज उठती जलतरंग ज्ञान मेरा सीमित सही जाना है पर मैंने- रवि शशि तारागण अनिल अनल विद्युत किरण नियन्ता के नियम बद्ध गतिमान सब जगत् के हैं देव रक्षक इन्द्र वरूण सोम प्रकृति कर रही सूत्र संचालन! तोड नियम नियन्ता का मिटा रहा मनुज सुख - शांति पावन लोभ-मोह के नागपाश से मूर्छित है चेतन काम-क्रोध के जटिल जाल से बुन रह अभिशप्त जीवन संतप्त प्रकृति- खो रही संतुलन! एक ओर जलाजल एक ओर सूखा स्थल भग्न हुआ कहीं- हृदय अवनी का कहीं हुई वह जल मग्न ! संख्या विस्फोट ने काटे वन, उजाडे घर व्याधियों न...